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सूचना पट्ट पर जनप्रतिनिधियों के नाम और संस्था का जिक्र, लेकिन बजट की राशि गायब।

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शिवाजीनगर छठ घाट पर लागत का ब्योरा गायब, असमंजस में डूबी जनता

असमंजस का बाजार: चर्चाओं में 55 से लेकर 90 लाख रुपये तक लागत का अनुमान।

बजट पूछने पर नगर पालिका के बाबू राजेश श्रीवास्तव ने जानकारी देने से किया साफ इंकार।

मोहम्मद नईम

कुशीनगर। विकास का मुख्य आधार जनहित, जवाबदेही और पूरी तरह से पारदर्शिता को माना जाता है। जिले कुशीनगर में इन बुनियादी सिद्धांतों की कितनी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं, इसकी बानगी नगर पालिका परिषद क्षेत्र के वार्ड नंबर 19 स्थित शिवाजीनगर में साफ देखी जा सकती है। यहां छठ घाट के सौंदर्यीकरण और इंटरलॉकिंग निर्माण कार्य को लेकर प्रशासनिक कार्यप्रणाली और जिम्मेदारों की नीयत पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा और चौंकाने वाला पहलू यह है कि इस पूरी परियोजना में लागत का ब्योरा पूरी तरह से गायब है, जिससे स्थानीय जनता के बीच असमंजस और विकास को लेकर कयासों का माहौल है।


पारदर्शिता के नाम पर कोरा धोखा और गायब आंकड़े:-

सरकारी नियमों के मुताबिक, किसी भी सार्वजनिक निर्माण कार्य के क्रियान्वयन में सबसे पहली अनिवार्यता 'पारदर्शिता' की होती है। शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि हर निर्माण स्थल पर एक सूचना पट्ट लगाया जाए, जिस पर योजना का पूरा नाम, स्वीकृत लागत, कार्य की लंबाई-चौड़ाई, कार्यदायी संस्था तथा कार्य प्रारंभ और समाप्ति की तिथि साफ-साफ दर्ज हो। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि आम नागरिक एक सजग प्रहरी की भूमिका निभा सके और निर्माण की गुणवत्ता पर नजर रख सके।

लेकिन शिवाजीनगर के इस छठ घाट पर लगा सूचना पट्ट कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। इस बोर्ड पर सिर्फ श्रेय लेने की होड़ साफ नजर आती है। कार्यदायी संस्था के रूप में 'नगर पालिका परिषद कुशीनगर' और 'राज्य वित्त आयोग' का उल्लेख तो है, साथ ही उद्घाटन या शिलान्यास की चमक-दमक के बीच जनप्रतिनिधियों के बड़े-बड़े नाम भी प्रमुखता से उकेरे गए हैं। यदि गायब है, तो सिर्फ वह मुख्य आंकड़ा जिससे जनता यह जान सके कि इस पर उसकी गाढ़ी कमाई का कितना पैसा खर्च हो रहा है।


55 लाख का बजट या कयासों का बाजार?:-

वित्तीय आंकड़े छिपाए जाने के कारण वार्डवासियों के मन में कई गंभीर और असहज सवाल खड़े हो गए हैं। स्थानीय स्तर पर दबी जुबान से चर्चा है कि इस पोखर और इंटरलॉकिंग के सुंदरीकरण के लिए करीब 55 लाख रुपये की भारी-भरकम धनराशि स्वीकृत हुई है। हालांकि, मौके पर कोई आधिकारिक दस्तावेज या बोर्ड पर राशि अंकित न होने के कारण कयासों का बाजार पूरी तरह गर्म है। कोई इसे 55 लाख की परियोजना बता रहा है, तो कोई इसे 65 लाख का बता रहा है, जबकि कुछ लोग इसकी लागत 90 लाख रुपये तक होने का दावा कर रहे हैं।

​जब लागत से जुड़ा कोई भी पारदर्शी ब्योरा मौके पर मौजूद नहीं है, तो जनता का यह सोचना स्वाभाविक है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था ही कटघरे में है। वार्डवासियों का तीखा आरोप है कि मौके पर हुए निर्माण की खराब गुणवत्ता को देखकर यह साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्वीकृत बजट का एक तिहाई हिस्सा भी जमीन पर नहीं उतर रहा है।

जानकारी मांगने पर बाबू ने साधी चुप्पी:-

इस पूरे प्रकरण मेंt जब मीडिया ने सच्चाई जानने की कोशिश की और नगर पालिका के बाबू राजेश श्रीवास्तव से छठ घाट के निर्माण बजट के बारे में जानकारी चाही, तो उनका रवैया बेहद गैर-जिम्मेदाराना रहा। उन्होंने साफ तौर पर बजट बताने से इनकार कर दिया और दो टूक कहा कि "मुझे इसकी जानकारी नहीं है और मैं बता भी नहीं सकता।" एक जिम्मेदार सरकारी कर्मचारी द्वारा इस तरह से जनहित से जुड़ी जानकारी छिपाना और कन्नी काट लेना कई बड़े संदेहों को जन्म देता है।


धन के बंदरबांट की चर्चाएं और जांच की मांग:-

निर्माण धनराशि को लेकर चल रही इन तमाम चर्चाओं, मौके पर हुए वास्तविक निर्माण के बीच भारी फर्क और जिम्मेदार बाबू के इस तरह के रवैये को देखकर स्थानीय स्तर पर जिम्मेदारों और ठेकेदार के बीच धन के बड़े पैमाने पर बंदरबांट होने की चर्चाएं जोरों पर हैं। हालांकि, इस बात में कितनी सच्चाई है, यह तो निष्पक्ष जांच का ही विषय है, लेकिन इतना जरूर है कि धुआं वहीं उठता है जहां आग होती है।

​असमंजस और भ्रष्टाचार की इस सुगबुगाहट ने आस्था के केंद्र माने जाने वाले छठ घाट की पवित्रता पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं। अब देखना यह होगा कि क्या उच्चाधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर पारदर्शिता और जमीनी हकीकत की जांच कराते हैं या फिर यह मामला भी फाइलों के शोर में दबकर रह जाएगा?

अधिशासी अधिकारी बोली:-

इस संबंध में अधिशासी अधिकारी से उनके मोबाइल फोन पर दो बार कॉल कर बात करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनके द्वारा फोन नहीं उठाया गया। हालांकि इससे पूर्व कार्य या निर्माण स्थल पर लगे शिलापट पर धनराशि व क्षेत्रफल न लिखने के सवाल पर ईओ ने कहा था कि शिलापट केवल शिलान्यास और लोकापर्ण का होता है, उस पर धनराशि और दूरी/क्षेत्रफल नहीं लिखा जाता है, केवल मिशन के कार्य जैसे स्वच्छ भारत मिशन के कार्यों पर यदि गाइडलान होती है तो ही धनराशि और क्षेत्रफल लिखा जाता है।

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